विभिन्न धर्मों में शादी
Last Updated : 2017-09-05 12:06:50 PM

हिंदू धर्म में  विवाह हिंदू धर्म में शादी के साथ बहुत सारी रस्में में और रीति-रिवाज होते हैं बल्कि यह रीति रिवाज और संस्कृति विदेशों में भी काफी प्रिय होती है | और उनके वैज्ञानिक कारण भी होते हैं जो दूल्हे और दुल्हन के लिए जरूरी भी  होते हैं | हिंदू विवाह में सगाई की अंगूठी पहनाना सबसे महत्वपूर्ण रस्म होती है |

हिंदू धर्म में शाम के वक्त शादी करना शुभ माना जाता है | हिंदू धर्म में 8 तरह की शादियां होती है आज हम आपको हिंदू धर्म के 8 तरह की शादियों के बारे में बताएंगे |

1.ब्रह्म विवाह

पहला ब्रह्म विवाह होता है जिसमें दोनों ही पक्षों की आपसी सहमति से रिश्ता तय किया जाता है | हिंदू धर्म में विवाह को पहले स्थान दिया गया है एक विवाह में लड़की को आभूषणों और दान दहेज के साथ विदा किया जाता है

2. दैव विवाह

इसमें सेवा कार्य के रूप में लड़की को दान कर दिया जाता है हिंदू धर्म के अनुसार कन्या को दान करना दैव विवाह कहलाता है |

3. आर्श विवाह

वह विवाह जिसमें  दूल्हे के परिवार वाले कन्या के  परिवार वालों को कन्या का मूल्य देते हैं उस विवाह को आर्श विवाह कहते हैं |

4. प्रजापत्य विवाह

किसी कन्या का विवाह उसकी अनुमति के बिना तथा उससे बड़ी उम्र वाले लड़के के साथ कर दिया जाए तो उसे प्रजापत्य विवाह कहते हैं |

5 गंधर्व विवाह

जब लड़का-लड़की परिवार की अनुमति के बिना शादी कर लेते हैं उसे गंधर्व विवाह कहते हैं।

6. असुर विवाह

जब किसी लड़की की कीमत चुका कर उसे खरीद कर शादी करना उसे असुर विवाह कहते हैं |

7. राक्षस विवाह

किसी लड़की के साथ जबरदस्ती या उसको अगवा कर कर उससे शादी करना एक राक्षस विवाह कहलाता है |

8. पैशाच विवाह

किसी लड़की के साथ जबरन संबंध बनाकर या फिर मजबूरी का फायदा उठाकर उससे शादी करने को पैशाच विवाह कहते हैं |

कन्यादान

इस दुनिया में हिंदू धर्म के लिए कन्यादान का सौभाग्य किस्मत वाले लोगों को ही मिलता है | कन्यादान को सामान्य दान नहीं कहा जा सकता कन्यादान का अर्थ बहुत बड़ा गहरा और महान होता है | कन्यादान का मतलब ढेर सारी जिम्मेदारी को हाथों में सौंपना | यह कन्यादान विधि कन्या के माता-पिता के द्वारा ही होता है अगर उसके माता-पिता नहीं है तो उसके रिश्तेदारों जैसे चाचा, मामा आदि द्वारा भी किया जा सकता है | अब तक जो अपनी बेटी का पालन पोषण, सुरक्षा, चीजों की पूर्ति, उसका विकास जोकि माता-पिता कर रहे थे अब उसकी जिम्मेदारी उसके पति और उसके परिवार वालों को करनी होगी |

कन्या के हाथ पीले कर माता-पिता अपने हाथों से कन्या के हाथों में गुप्त दान का धन और पुष्प रखकर संकल्प बोलते हैं उसके बाद उन हाथों को वर के हाथों में सौंप देते हैं | दूल्हा दुल्हन के हाथों को बड़े सम्मान और जिम्मेदारी के साथ स्वीकार करता हैं | इस दौरान कन्या के माता-पिता अपने सारे अधिकार उत्तरदायित्व को भी सौंपते हैं | कन्या के कुल गोत्र अब पिता परंपरा से नहीं पति परंपरा के अनुसार होंगे कन्या को यह भावनात्मक पुरुषार्थ करने तथा पति को उसे स्वीकार करने या निभाने की शक्ति देवशक्तियाँ प्रदान कर रही हैं | इस संकल्प के पूर्ण होने के बादसंकल्प करने वाला कन्या के हाथ वर के हाथों में सौपता है यही परंपरा कन्यादान कहलाती है |

रस्मे- हिंदू धर्म में कई तरह की रस्मे में होती हैं जैसे अंगूठी पहनाना, हल्दी का लेप लगाना, लड़की की मांग में सिंदूर भरना, अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लेना,कन्या के गले में वर के नाम का मंगलसूत्र पहनाना, चूड़ियां पहनाना आदि |

मुस्लिम धर्म में निकाह

विवाह को मुस्लिम धर्म में निकाह कहा जाता है इसका कोई विशेष मुहूर्त नहीं होता दूल्हा दुल्हन दोनों अपनी रजामंदी के बाद ही निकाह करते हैं  तथा 5 दिन का होता है | यह निकाह एक सामाजिक समझौता या नागरिक  समझौता होता है तथा भारत में मुस्लिम विवाह भी धार्मिक होता है  | यह भारतीय मुसलमानों में अन्य समुदाय की तुलना में इसमें  तालाक की संभावना ज्यादा है तथा इसकी पारिभाषिक विशेषताएं एक जैसी होती हैं |

 निकाह में भागीदारी

 मुस्लिम धर्म के  निकाह पर्सनल लॉ के अनुसार यह चार भागीदारों का होना जरूरी है:-

  1.  दुल्हन
  2.  दूल्हा
  3.  काजी
  4.  गवाह , इसमें 2 पुरुष और 4 महिलाएं जो धार्मिक कानूनी समझौते के साक्षी होते हैं |

इसमें काजी दूल्हा तथा दुल्हन को  चुने हुए गवाहों के सामने पूछते हैं कि वे इस विवाह के लिए राजी है या नहीं | यदि वह राजी हैं निकाह की घोषणा करते हुए निकाहनामा पर समझौते का कार्य पूरा करते हैं इस निकाहनामे में मेहर की रकम भी होती है यह एक प्रकार का स्त्री धन ही होता है इस रकम को निकाह के बाद दूल्हा-दुल्हन को देता है भारत में विवाह की रस्म हिंदू मुसलमानों में दुल्हन के घर पर ही की जाती है क्योंकि यह पुरानी प्रथा है | कहीं-कहीं प्रथायें  समान भी मानी जाती हैं जैसे- केरल के मुसलमानों में “कल्याणम” नामक हिंदू कर्मकांड निकाह के लिए आवश्यक होता है | मुसलमानों में चचेरे भाई बहनों का निकाह पसंदीदा होता हैमुसलमान समुदाय में पुनर्विवाह को बुरा नहीं माना जाता | मुसलमानों में दो प्रकार कि अवधारणा होती है नियमित (सही) तथा अनियमित (फसीद) | अनियमित निकाह  इन कारणों से होता है:-

  1. अगर निकाह  आरंभ करते समय गवाह अनुपस्थित हो |
  2. अगर एक पुरुष का यह पांचवा विवाह हो |
  3. मुसलमानों में महिला के पति की मृत्यु के बाद 40 दिनों तक दूसरा विवाह नहीं कर सकती |
  4. पति और पत्नी के धर्म में अंतर होने पर |

 रस्मे - रुक्का, तारीखें, मेहंदी, निकाह, निकाहनामा, दिगाना रुकाई, रुक्सत, वालीमा, चौथी |

सिख धर्म में शादी

सिख धर्म में पुरानी परंपराओं के साथ जोश में संगीत ढोल नगाड़े, नाच (भांगड़ा) पंजाबी गानों के साथ विवाह होता है | सिख विवाह को आनंद व उल्लास का कारज कहा जाता है | सिख गुरुओं की सीख के अनुसार पारिवारिक जीवन बहुत महत्वपूर्ण होता है | तथा विवाह के शुभ कार्य का दर्जा सबसे ऊंचा होता है | आखिरकार साठ साल बाद सीखो को हिंदू कानून से मुक्ति मिल गई अब सिख अपनी शादी हिंदू कानून के तहत ना करकर एक आनंद विवाह के तहत करेंगे | रोका या  रोकना इसमें लड़के के परिवार वाले शगुन तथा बहुत सारे उपहारों के साथ लड़की वाले के घर जाते हैं इस वक्त लड़की अनुपस्थित होती है |

सगाई

विवाह होने के बाद दूल्हा दुल्हन के माता-पिता रिश्तेदार सहित लड़के घर जाकर उसे, अंगूठी, कड़ा, कृपाण और उपहार भेंट में देते हैं | दुल्हन के घर से आया हुआ छुआरा लड़का खाता है, और अपनी सहमति व्यक्त  करता है | तथा इसकी समाप्ति लड़के के सर के ऊपर से रुपए घुमा कर दान किया जाता है तथा अरदास होती हैं | सिख विवाह ज्यादातर गुरुद्वारे में ही होते हैं तथा विवाह दिन में ही संपन्न होते हैं दूल्हा गुरु ग्रंथ साहिब के पास बैठता है और दुल्हन बायीं ओर बैठती है इसके बाद बुजुर्ग विवाह संपन्न कराते हैं व उनके कर्तव्य तथा दायित्व निभाने की सलाह देते हैं | ईश्वर से प्रार्थना करते हैं |

लवण या लावा

इसमें दुल्हन के पिता केसरिया रंग की पगड़ी पहनते हैं, उसका एक सिरा दूल्हे के कंधे पर रखते हैं तथा दूसरा सिरा दुल्हन के हाथ में दिया जाता है इस तरह ग्रंथ साहिब के 4 फेरे लेते हैं जिसे लावण लावा कहां जाता है

दूसरा लवण

इसमें एक दूसरे के प्रति समर्पण को दिखाया गया है कहा गया है कि सच्चे गुरु से मिलान होता है तथा हृदय के स्वार्थ को बाहर निकाल देना चाहिए |

तीसरा लवण

इस लवण में भावों को दिखाया गया है तथा ईश्वर के नाम से हमारी आत्मा मुक्ति प्राप्त करती है |

चौथा लवण

अंतिम लवण में आत्मा के मिलन को  दर्शाया किया गया है तथा भक्ति के साथ दोनों का मिलन होता है जिसके कारण हृदय में नाम बस जाता है 4 फेरों के बाद आनंद साहिब का पाठ होता है तथा अरदास की जाती है |

रस्म- रोका, चुन्नी समारोह, सगाई, मेहंदी समारोह, लेडीज संगीत, कंगना बांधना समारोह, चूड़ा चढ़ाना,  हल्दी समारोह, घरा घरदोली आदि |

ईसाई धर्म में शादी

ईसाई विवाह को सादगी के तरीके से चर्च में किया जाता है जिसमें फादर की उपस्थिति में दूल्हा दुल्हन कुछ महत्वपूर्ण वचन लेते हैं दुल्हन सफेद पोशाक (गाउन) पहनती है तथा फूलों का गुलदस्ता हाथों में पकड़ती है और दूल्हा काले कलर का कोट सूट पहनकर विवाह के लिए तैयार होता है |

मॉसिमेज

मंगनी की हर रस्म दुल्हन के घर पर ही होती है जिसमें करीबी रिश्तेदार शामिल होते हैं पादरी के कहने पर दोनों एक दूसरे हाथ में अंगूठियां पहनते हैं तथा पादरी बाइबल से कुछ उपदेश पड़ता है | उसी दिन शादी तारीख तय की जाती है तथा मेहमानों के लिए दावत रखी जाती है | पहले शादी की घोषणा होती है उसके बाद शादी होती है |

दुल्हन का स्वागत

इसमें दूल्हा पहले चर्च में पहुंचता है और दुल्हन का इंतजार करता है | दुल्हन अपने पिता के साथ चर्च में आती है तथा दुल्हन के आने पर उसके हाथों में गुलदस्ता देकर उसका स्वागत किया जाता है | उसके बाद पादरी पवित्र बाइबल पढ़ते हैं जिसे होमिली कहते हैं | होमिली पढ़ने के बाद दूल्हा दुल्हन एक दूसरे को अंगूठी पहनाते हैं और पादरी उन्हें आशीर्वाद देता है | अंतिम रस्म यह होती है कि गवाहों और दूल्हा-दुल्हन के हस्ताक्षर, हस्ताक्षर पत्र को रजिस्ट्रार के पास जाकर दिया जाता है | विवाह के पश्चात दूल्हा दुल्हन और बाकी सब चर्च से बाहर निकलते हैं और दुल्हन फूलों के गुलदस्ते को पीछे की ओर उछलती है | ऐसी मान्यता है कि जो लड़की इस फूलों के गुलदस्ते को पकड़ पाएगी उसका विवाह जल्दी हो जाएगा | फूलों के गुलदस्ते फेंकने वाली रस्म को डिपार्चर कहते हैं |

रिसेप्शन

ईसाई धर्म में विवाह का भोजन रात्रि के समय होता है | जिसमें दोनों के रिश्तेदार होते हैं इसमें दूल्हा-दुल्हन के माता-पिता खुशियां मनाते हैं सभी संगीत और नृत्य का आयोजन करते है तथा बैचलर पार्टी होती है | इस पार्टी में दूल्हे के मित्र व रिश्तेदार शामिल होते हैं, तथा सारी रात जश्न मनाते हैं यह दोनों रस्मे अनौपचारिक होती है |

बंगाली शादी

इसमें वर-वधू, माता पिता, संबंधी सब एक साथ मिलकर विवाह की ता

रीख तय करते हैं | विवाह के एक दिन पहले दूल्हा दुल्हन के घर पर पूर्वजों के लिए पूजा संपन्न की जाती है जिसे विधि और विरिधि कहते हैं | सूर्योदय होने से पहले दोधी मंगल विधि की जाती है इस विधि में 10 सुहागन महिलाएं दूल्हा दुल्हन के साथ तालाब के पास जाते हैं तथा देवी गंगा को आमंत्रित करते हैं जाते वक्त कलश में जल भरकर अपने साथ ले जाते हैं इस जल को दोनों के स्नान के उपयोग में लाया जाता है | इसके बाद विवाह की धर्म की रस्मे होती है, इसमें दुल्हन के माता-पिता नहीं होते | वर के आने पर घंटी और शंख से उसका स्वागत किया जाता है, तथा उसका मुंह मीठा कराया जाता है उसके बाद परिवार के सदस्यों के साथ पूजा संपन्न करते हैं तथा दूल्हा-दुल्हन वरमाला पहनाते हैं इस रस्म को मालाबदल के नाम से जाना जाता है | पूरी रात सब एक दूसरे के साथ खेल खेलते हैं गीत गाते हैं | सुबह होने पर दुल्हन की मांग में सिंदूर भरा जाता है, तथा पूजा की जाती है | इसके बाद दूल्हा-दुल्हन सभी का आशीर्वाद लेकर घर की ओर रवाना होते हैं | इसमें बहूभात तथा फूल सज्जा की रस्म भी होती है |

दक्षिणी राज्य में शादी

तेलुगु शादी को पुरानी परंपराओं के साथ पूर्ण किया जाता है जिसके कारण हिंदू तथा तमिल के विवाहो के साथ समानता भी होती है | तेलुगु संस्कृति की विशेषता यह है कि दुल्हन-दुल्हे को समाज में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, दुल्हन को अर्धांगिनी और दुल्हे को अच्छा माना जाता है | कोई भी रस्में रिवाज दुल्हन के बिना पूर्ण नहीं मानी जाती | इसमें सबसे पहले शुभ समय का फैसला किया जाता है उसके बाद दुल्हन को तेल और हल्दी लगाई जाती है उसके बाद दुल्हन स्नान करती है | स्नाथकम रस्म में दूल्हा चांदी का एक धागा पहनता है |दक्षिणी राज्य में काशी यात्रा एक मशहूर रिवाज होता है इसमें दूल्हा काशी छोड़ने का दिखावा करता है और दुल्हन का भाई इसमें दखल देता है जो अपनी बहन को देने का दावा करता है | विवाह के दिन दूल्हा दुल्हन मंगला सनाणम करते हैं इसमें दूल्हा-दुल्हन पवित्र स्नान करते हैं स्नान के बाद तेल से अभिषेक किया जाता है और गौरी की पूजा होती है इसके बाद मंडप में गणेश पूजा करते हैं और अनुरोध करते हैं कि भगवान सभी बाधाओं को दूर कर दे | दुल्हन को मंडप में मामा द्वारा लाया जाता है पुजारी मंत्र के दौरान उनके बीच एक पर्दा डालता है इसके बाद कन्यादान दुल्हन के पिता द्वारा किया जाता है मंगलसूत्र बांधते समय पर्दा हटा दिया जाता है इसमें भी हिंदुओं समान विवाह होता है सात फेरे लेते हैं उसके बाद वर दुल्हन के पैर के अंगूठे से चांदी का छल्ला निकालता है इसे स्टैलीपाकाम कहते हैं |

मराठी विवाह

महाराष्ट्र शादी पूरे देश में सबसे सरल और धनी शादी है | यह शादी एक उपयुक्त कार्य विधि खोलने के साथ शुरू होती है इसमें लड़की और लड़के का राशि मिलान किया जाता है उसके बाद विवाह मुहूर्त निकाला जाता है | शादी के रीति रिवाजों के साथ-साथ शादी की तैयारी की जाती है | विवाह में दूल्हा दुल्हन के परिवार के द्वारा सारी मिठाइयां और चीनी दी जाती है | अगला कार्य दूल्हा-दुल्हन दोनों के घर पर किया जाता है जिसमें कुलदेवी की एक छोटी सी पूजा की जाती है और भोजन होता है उसके बाद एक सीमंत पूजा होती है जिसमें एक बार दुल्हन की जगह दूल्हा आता है और उसके माता-पिता उन्हें उपहार प्रदान करते है इसके बाद एक रेशम शाल से दुल्हन और दूल्हे को अलग किया जाता है तथा दुल्हन के मामा उन्हें दायरे में लाते हैं जहां मंगल शतक का पाठ पढ़ा जाता है | उसके बाद शाल को निकाल दिया जाता है तथा जोड़े पहली बार एक दूसरे को देखते हैं | उसके बाद दूल्हा-दुल्हन अपने माता-पिता से शादी की अनुमति के लिए पूछते हैं इसे संकल्प समारोह कहते हैं | दुल्हन के माता-पिता कन्यादान की पूजा करते हैं, जिसमें अपनी बेटी को दूल्हे को प्रदान करते हैं | कन्यादान के बाद दूल्हा दुल्हन को मंगलसूत्र पहनाता हैं तथा दुल्हन की मांग में सिंदूर भरता हैं दुल्हन बदले में दूल्हे के माथे पर चंदन का तिलक लगाती है इसमें अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लिए जाते हैं | जिसमें 7 प्रतिज्ञाएं होती है और इसी के साथ समारोह का कार्य समाप्त होता है जिसमें दुल्हन के पिता दुल्हन दुल्हन को आशीर्वाद देते हैं |

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